ॐ....
आज जानिए छोटी दिवाली या नरकचतुर्दशी या रूप चौदस या काली चौदस के बारे मे। यह कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी अर्थात चौदहवें दिन आता है, इसे भारत के विभिन्न क्षेत्रों अलग अलग नाम से जानते है, जैसे रूप चौदस, काली चौदस भी कहा जाता है। जानते है इस दिन का इतना महत्व क्या है , चलिए जानते है...
यह दिन दीपावली के एक दिन पहले मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार नरकासुर नाम के असुर ने १६००० कन्याओं को बंधक बना लिया था। भगवान कृष्ण को नरकासुर के साथ युद्ध करना पड़ा कन्याओं को छुडाने के लिए। इसी युद्ध के कारण इस दिन नरक चतुर्दशी की पूजा होती है। भगवान कृष्ण ने नरकासुर का वध कर उन सभी कन्याओं को मुक्त करवाया। परन्तु नरकासुर से मुक्त होने के बाद सभी कन्याओं के मन में इस बात का भय था कि क्या उन्हें समाज स्वीकार करेगा, उनका भविष्य क्या होगा? इस समस्या को लेकर वो भगवान श्री कृष्ण के पास गईं और अपने मन की बात कही। सभी कन्याओं ने कहा कि कृष्ण अब आप ही हमें कुछ सुझाव दीजिये।
इस पर भगवान श्रीकृष्ण और उनकी पत्नी सत्यभामा ने यह सुझाव दिया कि उन सभी लड़कियों को श्री कृष्ण से विवाह कर लेना चाहिए, इसके बाद उन्हें कृष्ण की पत्नी के रूप में पहचाना जाएगा। तत्पश्चात श्री कृष्ण की १६,००० पत्नी थी यह जाना गया।
इस ही दिन लोग गंगा स्नान या अभ्यंग स्नान करते हैं। शास्त्रों के अनुसार इस दिन गंगा स्नान से जातक के सभी पाप मिट जाते हैं और वह नरक में जाने से बच जाता है।
जानिए कैसे स्नान करें इस दिन:-
जो भी नरक से मुक्ति चाहता है, उसे आज तिल के तेल से स्नान करना चाहिए। सुबह सूर्योदय से पहले उठ कर स्नान करना चाहिए क्योंकि तिल के तेल में इस दिन लक्ष्मीजी का वास होता है और पानी में गंगा माता का वास होता है। तिल के तेल को माथे पर व शरीर में लगा कर, शुक्ष्म पानी से स्नान करें। शिकाकाई पाउडर से स्नान करें। इस स्नान के समय, एक और आवश्यक कर्म करना चाहिए। स्नान करते समय "अपामार्ग" के पत्तों को अपने मस्तिष्क के ऊपर, निम्नलिखित मंत्र के उच्चारण के साथ घूमना चाहिए।
इस मंत्र के उच्चारण से भूतकाल में किये हुए पाप धूल जाते है। अपामार्ग को कई नाम से जाना जाता है। नायुरुवी तमिल में, चिरचिटा हिंदी में, अघाडा मराठी में,उत्तरैणी तेलुगु व कन्नड़ में और प्रिक्क्ली चाफ इंग्लिश में। पत्तो को दक्षिणावर्त दिशा (clockwise) में, मस्तिष्क के ऊपर ३ बार घुमा कर छोड़ दें।
इस दिन को रूपचतुर्दशी भी कहते है जिसमें हमारे बाह्य आवरण का शृंगार किया जाता है....पर पहले अँतकरण शुद्ध करना आवश्यक। पंचगव्य यहाँ हमारी सहायता करता है जब हम उसे अपने दिनचर्य में समावेश करते है।
आज जानिए छोटी दिवाली या नरकचतुर्दशी या रूप चौदस या काली चौदस के बारे मे। यह कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी अर्थात चौदहवें दिन आता है, इसे भारत के विभिन्न क्षेत्रों अलग अलग नाम से जानते है, जैसे रूप चौदस, काली चौदस भी कहा जाता है। जानते है इस दिन का इतना महत्व क्या है , चलिए जानते है...
यह दिन दीपावली के एक दिन पहले मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार नरकासुर नाम के असुर ने १६००० कन्याओं को बंधक बना लिया था। भगवान कृष्ण को नरकासुर के साथ युद्ध करना पड़ा कन्याओं को छुडाने के लिए। इसी युद्ध के कारण इस दिन नरक चतुर्दशी की पूजा होती है। भगवान कृष्ण ने नरकासुर का वध कर उन सभी कन्याओं को मुक्त करवाया। परन्तु नरकासुर से मुक्त होने के बाद सभी कन्याओं के मन में इस बात का भय था कि क्या उन्हें समाज स्वीकार करेगा, उनका भविष्य क्या होगा? इस समस्या को लेकर वो भगवान श्री कृष्ण के पास गईं और अपने मन की बात कही। सभी कन्याओं ने कहा कि कृष्ण अब आप ही हमें कुछ सुझाव दीजिये।
इस पर भगवान श्रीकृष्ण और उनकी पत्नी सत्यभामा ने यह सुझाव दिया कि उन सभी लड़कियों को श्री कृष्ण से विवाह कर लेना चाहिए, इसके बाद उन्हें कृष्ण की पत्नी के रूप में पहचाना जाएगा। तत्पश्चात श्री कृष्ण की १६,००० पत्नी थी यह जाना गया।
इस ही दिन लोग गंगा स्नान या अभ्यंग स्नान करते हैं। शास्त्रों के अनुसार इस दिन गंगा स्नान से जातक के सभी पाप मिट जाते हैं और वह नरक में जाने से बच जाता है।
जानिए कैसे स्नान करें इस दिन:-
जो भी नरक से मुक्ति चाहता है, उसे आज तिल के तेल से स्नान करना चाहिए। सुबह सूर्योदय से पहले उठ कर स्नान करना चाहिए क्योंकि तिल के तेल में इस दिन लक्ष्मीजी का वास होता है और पानी में गंगा माता का वास होता है। तिल के तेल को माथे पर व शरीर में लगा कर, शुक्ष्म पानी से स्नान करें। शिकाकाई पाउडर से स्नान करें। इस स्नान के समय, एक और आवश्यक कर्म करना चाहिए। स्नान करते समय "अपामार्ग" के पत्तों को अपने मस्तिष्क के ऊपर, निम्नलिखित मंत्र के उच्चारण के साथ घूमना चाहिए।
सीतालोष्ट समयुक्ता सकण्टका दलान्वित।
हर पापमपामार्गम भ्रह्मयमाणाः पुनः पुनः।।
| अपामार्ग फूल एवं पत्ते |
इस दिन को रूपचतुर्दशी भी कहते है जिसमें हमारे बाह्य आवरण का शृंगार किया जाता है....पर पहले अँतकरण शुद्ध करना आवश्यक। पंचगव्य यहाँ हमारी सहायता करता है जब हम उसे अपने दिनचर्य में समावेश करते है।
अमिताभ भटनागर
MD &CEO
मलती गौषधि प्रा ली
www.gavyachetna.com
MD &CEO
मलती गौषधि प्रा ली
www.gavyachetna.com
No comments:
Post a Comment